मंदिर


श्री आदिनाथ जिनालय श्री आदिनाथ भगवान
१. नारलाई गाँव के मुख्य द्वार के संमुख श्री आदिनाथ भगवान का प्राचीन एवं विशाल जिनालय है| इस मंदिर में ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की द्ष्टी से कई महत्वपूर्ण शिलालेख हैं, जो जिनविजय द्वारा संग्रहित प्राचीन जैन लेख संग्रह भाग २ पुस्तक में उल्लेखित हैं| सन् १९४४-४५ में जोधपुर म्युजियम में राणकपुर के जगप्रसिद्ध मंदिर के साथ इस आदिनाथ मंदिर का चित्र भी था| इस चित्र में इस मंदिर को १२०० वर्ष पुराना मंदिर बताया गया था| मंदिर में विद्यमान एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण काल वि. सं. ९६४ बताया गया है| पहले कभी इस मंदिर में मूलनायकजी भगवान महावीर स्वामीजी थे| अतः यह मंदिर वीरा - देवल के नाम से भी जाना जाता है| एक प्रचलित कथा के अनुसार यह मंदिर वि. स. ९६४ के आसपास खण्डेरगच्छीय, महान चमत्कारिक, विद्या सिद्ध, पुज्य आचार्य श्री यशोभद्र सुरिश्वरजी द्वारा वल्लभीपुर से अपनी साधना शक्ति द्वारा आकाशमार्ग से लाया गया बताया जाता है| एक अन्य लोक कथा के अनुसार प्रकाण्ड विद्वान आचार्य श्री यशोभद्र सुरिश्वरजी एवं योगी तपेश्वरजी के द्वारा यह आदिनाथ भगवान का मंदिर एवं तपेश्वर महादेव का मंदिर मंत्र शक्ति से लाये गये हैं|

कहा जाता है की आचार्य श्री यशोभद्र सुरिश्वरजी एवं तपेश्वरजी के बीच कई बार शास्त्रार्थ हुआ अतः आचार्य से प्रभावित होकर तपेश्वरजी ने आचार्य श्री यशोभद्र सुरिश्वरजी से दीक्षा ग्रहण की| वे केशव सुरी एवं वासुदेवाचार्य के नाम से विख्यात हुए|

इन्ही केशवसुरी ने आगे चल कर हथुंडी (राता महावीरजी) के राजा विदग्धराज को प्रतिबोधित कर जैन धर्म अंगिकार करवाया था| तपेश्वरजी द्वारा लाया गया शिवमंदिर आज भी नारलाई में तपेश्वर महादेव मंदिर के नाम से विख्यात हैं| इन दोनों विद्वान, मंत्र सिद्ध विभूतियों का स्वर्गवास इसी नारलाई गाँव में हुआ था| इनके स्तूप आज भी नारलाई गाँव में विद्यमान हैं जो एशिया एवं केशीया के नाम से जाने जाते हैं| श्री लावण्यमयजी द्वारा रचित तीर्थ माला में उपर्युक्त वृत्तांत आता हैं|

भगवान आदिनाथ के इस मंदिर के विशाल रंगमंडल के गुम्बज में चित्रित ऐतिहासिक रंगीन चित्रों की कला प्राचीन होते हुए भी स्पष्ट एवं सुन्दर दिखाई देती है| इन चित्रों द्वारा कलाकार ने, बाइसवें तीर्थंकर श्री नेमनाथ जब महाराजा उग्रसेन की लाडली पुत्री राजुल से विवाह रचाने जा रहे थे, उस बारात को दर्शाया हैं| मंदिर के प्रांगण में बायी ओर बिराजमान अधिष्टायक देव की मूर्ति महान चमत्कारिक है| इसे गाँव के सभी जैन-अजैन बडी श्रद्धा से नमन करते हैं| इस मंदिर के प्रवेशद्वार के बाहर, दाँये-बाँये दोनों ओर चबूतरों पर, परस्पर सन्मुख दो विशाल हाथी बने हुए हैं, जो मंदिर की बाह्य शोभा में अभिवृद्धि करते हैं| वि. स. २०२९ में सम्पन्न प्रतिष्ठा महोत्सव में इस मंदिर के विशाल शिखर पर २४ फुट ऊँचे स्वर्ण मंडित दण्ड-कलश का रोपण किया गया है| इस मंदिर के प्रवेशद्वार के सामने सिढियों के उपर एक शिला रखी हुई है| जिसका मुख्य कारण प्राचीन मुगल काल में मुगल सैनिकों को घोडों पर बैठकर मंदिर में प्रवेश करने से रोकना था| तथा वर्तमान में दर्शक नमन कर मंदिर में प्रवेश करते हैं|


श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय
२. नारलाई गाँव के मुख्य बाजार के मध्य में, श्री नारलाई श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ के मुख्य कार्यालय के समक्ष, श्री नारलाई जैन संघ द्वारा निर्मित, श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान का जिनालय है| वि. सं. २०२८ द्वितीय वैशाख शुक्ल षष्ठि, दि. १९-५-७२ के शुभ दिन गुरुपुष्यामृत योग में श्री मुनिसुव्रत स्वामी आदि नूतन जिनबिम्बों की अंजनशलाका विधि संपन्न कराकर, स्व. आचार्य श्रीमद् जिनेन्द्रसुरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा की पावन निश्रा में, द्वितीय वैशाख शुक्ल दशमी सोमवार के शुभ दिन रविश्रीवत्सादि शुभ योग समलंकृत शुभ लग्नांश वेला में सविधि प्रतिष्ठा कराई गई|


श्री अजितनाथ जिनालय
श्री अजितनाथ
भगवान
३.नारलाई गाँव के दक्षिण - पूर्वी भाग तथा गिरनार तीर्थ की तलहटी में उत्तराभिमुख श्री अजितनाथ भगवान का प्राचीन जिनालय है| इस मंदिर में श्री अजितनाथ भगवान की गहरे पीतवर्णी (गहरे पीले रंग की) प्राचीन मुर्ति बिराजमान है| इस मंदिर के प्रवेश द्वार के पास बने चबूतरों पर परस्पर सन्मुख दो हाथी बने हुए है| तथा मुख्य प्रवेशद्वार पर पाषाण की शिला रखी हुई थी| इस मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य वि.सं. २०४८-४९ में श्री नारलाई श्वेताम्बर मूर्तिपूतक जैन संघ द्वारा कराया गया हैं|


श्र ी सुपार्श्वनाथ
भगवान
श्र ी सुपार्श्वनाथ जिनालय
४.गाँव के पूर्वी भाग तथा श्री अजितनाथजी के दाहिनी ओर पश्चिमाभिमुख श्र ी सुपार्श्वनाथ भगवान का जिनालय है| इस मंदिर में श्री सुपार्श्वनाथ भगवान की नयनरम्य विशाल मूर्ति बिराजमान है| इस मंदिर के रंगमण्डप में बिराजमान प्रतिमाओं में से एक श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान की प्रतिमा पर शिलालेख क्रमांक ३४० चार पंक्तियों में अंकित है| इस लेख में जताया हैं कि महाराजाधिराज श्री अभयराज के राज्यकाल में वि. सं. १७२१ जेठ शुक्ल तृतिया के दिन प्रागवाट (पोरवाल) ज्ञाति के सा. जीवा तथा माता जसमादे के पुत्र सा नाथा ने इस प्रतिमा को भराया जिसकी प्रतिष्ठा भट्टारक श्री विजय प्रभसूरी ने करवाई| उस समय में नारलाई गाँव में जैनों के २७०० घर थे अतः इस विशाल मंदिर के दो द्वार बने हुए है| इस मंदिर के निर्माण की यह विशेषता है कि मंदिर के मुख्य द्वार के समक्ष भूमि पर खडे रहकर, घोडे पर सवार होकर या हाथी कि अम्बाडी पर बैठकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथजी के दर्शन किए जा सकते हैं|


श्री शांतिनाथ जिनालय श्री शांतिनाथ भगवान
५. श्री सुपार्श्वनाथजी के पीछे गाँव के पूर्वी भाग में एक छोटीसी टेकरी पर बना हुआ उत्तराभिमुख श्री शांतिनाथ भगवान का प्राचीन जिनालय है| यह मंदिर सोनाणां आरस पत्थर से बना हुआ है| इस मंदिर में शांतिनाथ भगवान की शीतल मनमोहक प्रतिमा बिराजमान है जिसके दर्शन कर यात्रिक धन्य हो जाते है| इस मंदिर के मूलगंभारे के पिछले बाहरी भाग (भमटी) में बनी हुई मैथुन शैली (कामकला) की मूर्तिकला सोनाणां आरस में खुदी हुई हैं जो प्राचीन स्थापत्यकला का अनुपम उदाहरण हैं| इस मंदिर से प्राप्त एक मूर्ति बाजरीया पत्थर से बनी हुई है जो इस मंदिर की प्राचिनता की द्योतक है| सोनाणां पत्थर तथा बाजरीया पत्थर नारलाई व सोनाणां जो नारलाई से करीब १० कि.मी. की दूरी पर है वहीं प्राप्य है| वि. सं. २०५१ में श्री नारलाई श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया है|


श्री नमीनाथ
भगवान
श्री नमीनाथ जिनालय
६. श्री शत्रुंजय तीर्थ की तलहटी व गाँव के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित चार मंदिरों में से प्रथम श्री नमीनाथ भगवान का मंदिर है| यह एक पूर्वाभिमुख विशाल मंदिर है| इसमें इक्कीसवें तीर्थंकर भगवान श्री नमीनाथजी की विशाल प्राचीन प्रतिमा बिराजमान है| इस मंदिर में स्थित केशर घिसने की प्राचीन शिलाओं का विशाल आकार इस बात का प्रमाण है कि उस समय इस गाँव की वस्ती वर्तमान से कई गुना अधिक थी|


श्री सोगटिया पार्श्वनाथ
जिनालय
श्री सोगटिया
पार्श्वनाथ भगवान
७. श्री नमीनाथ जिनालय से करीब १०० फुट की दूरी पर श्री सोगटिया पार्श्वनाथ भगवान का पूर्वाभिमुख मंदिर है| इस मंदिर में श्री सोगटिया पार्श्वनाथ भगवान की प्राचीन प्रतिमा बिराजमान है| भारत देश के किसी भी राज्य में जहा जहा १०८ पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर बनाया जाता है उसमें नारलाई के श्री सोगटिया पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा अवश्य होती है|


श्री गोडी पार्श्वनाथ भगवान श्री गोडी पार्श्वनाथ जिनालय
८. श्री सोगटिया पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर से ५० फुट की दूरी पर पूर्वाभिमुख श्री गोडी पार्श्वनाथ प्रभु का विशाल मंदिर है| इस मंदिर का कलात्मक शिखर सोनाणां पत्थर से बना हुआ है| मंदिर के दो प्रवेशद्वार है| मंदिर के बाहरी रंगमण्डप के गुम्बज में बनी ८ पुतलियाँ प्राचीन शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है| इस मंदिर के उत्तरी भाग में देहरी बनी हुई है तथा इस देहरी के पास उत्तराभिमुख द्वार बना है| मंदिर के दक्षिणी भाग में भमटी में बहुत कम जगह है जहाँ से एक व्यक्ति ही चल सकता है किन्तु उत्तरी भाग में काफी जगह है| जिर्णोद्धार कार्य के समय इस मंदिर में भूमिगत गुप्त कमरा प्राप्त हुआ है जिसमें भगवान के प्रभासन का आकार बना हुआ है| यह कमरा उस काल में शायद संकट के समय भगवान की प्रतिमायें सुरक्षित रखने हेतु बनाया गया हो|


श्री वासुपूज्य स्वामी जिनालय श्री वासुपूज्य स्वामी
९. श्री गोडी पार्श्वनाथ जिनालय के उत्तरपूर्व में पूर्वाभिमुख श्री वासुपूज्य स्वामी का मंदिर है| यह मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है तथा इसके प्रवेशद्वार के बाहर दोनों तरफ बडी चबुतरियाँ हैं| इस जिनालय में श्री वासूपुज्य स्वामीजी की प्राचीन मनोहर प्रतिमा बिराजमान है| अतः इस मंदिर को तीजनियों का मंदिर भी कहा जाता था| प्राचीन काल में नारलाई गाँव में जैनों की अधिकतर बस्ती इसी भाग में रही होंगी, इस बात के कई प्रमाण इस क्षेत्र में आज भी मिलते हैं|


श्री आदिनाथ
भगवान
श्री शत्रुंजय तीर्थ
१०. गाँव के उत्तरी भाग में स्थित जैकल पर्वत के पूर्वी भाग में पहाडी पर किलानुमा आकार की चारदीवारी के बीच श्री शत्रुंजय तीर्थ पर श्री आदिनाथ भगवान का ऐतिहासिक मंदिर बना हुआ है| इस मंदिर में श्री आदिनाथ भगवान की ३६७ वर्ष प्राचीन प्रतिमा बिराजमान हैं| शिलालेख क्रमांक ३४१ इसी प्रतिमा की गादी पर अंकित है| इस लेख में लिखा जाता है कि जैकल पर्वत पर संप्रतिमहाराजा द्वारा निर्मित जीर्ण मंदिर का, महाराणा श्री जगतसिंहजी के राज्य में, श्री नाडुलाई के समस्त जैन संघ ने उद्धार करवाया तथा बादशाह अकबर द्वारा प्रदत्त जगदगुरु विरुदधारक तपागच्छीय भट्टारक श्री श्री श्री श्री श्री हीरविजय सुरीश्वरजी के पट्टप्रभाकर श्री विजयसेन सूरीश्वरजी के पट्टालंकार भट्टारक श्री विजयदेवसुरीजी ने अपने विजयप्रभसुरी आदि शिष्य परिवार के साथ वि. सं. १६८६, वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, अष्टमी के दिन शनिपुष्ययोग में इस मंदिर में श्री श्री आदिनाथ भगवान की प्रतिमा, जो नारलाई जैन संघ समस्त द्वारा भराई गई थी, की प्रतिष्ठा की|


श्री नेमिनाथ भगवान
११. श्री शत्रुंजय गिरिराज के ठीक सन्मुख गाँव के दक्षिण पूर्व अर्थात अग्निकोण में एक पहाडी पर इतिहास प्रसिद्ध जिनालय है| यह जिनालय गिरनार तीर्थ के नाम से विख्यात है| इस मंदिर में श्री नेमिनाथ भगवान की प्राचीन, श्यामवर्णीय, प्रकट-प्रभावी, मनोहर मूर्ति बिराजमान है| इस जिन प्रासाद का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्दुम्नकुमार ने करवाया था| प्राचीन काल में श्री नेमीनाथ को 'जादवजी' तथा इस पहाडी को 'यादव टेकरी' कहा जाता था| ऐसा उल्लेख 'विजय प्रशस्ति महाकाव्य' में है| श्री समयसुन्दरजी रचित 'तीर्थमाला' के स्तवन में 'श्री नाडोलाई जादवो' वाक्य से भी उपरोक्त कथन का सत्यापन होता है|