नारलाई गाँव का इतिहास

नारलाई गाँव अपने अनुपम सौंदर्य और संपूर्ण गरिमा के साथ पहाडियों की हरीभरी गोद में बसा हैं| राजस्थान राज्य के पाली जिले में स्थित यह गाँव गोडवाड की प्राचीन पंच तीर्थि का महत्वपूर्ण तीर्थ हैं| आज भी दूर-दूर से जैन यात्री इस पंचतीर्थि के दर्शनार्थ आते हैं| मुम्बई-अहमदाबाद-दिल्ली रेल मार्ग पर स्थित फालना स्टेशन से ४९ व रानी स्टेशन से ३० किलोमीटर दूर यह प्राचीनतम तीर्थ अपने अंदर गौरवशाली इतिहास छिपाये हैं| एक तरफ मुछाला महावीर एवं राणकपुर तथा दुसरी तरफ नाडोल एवं वरकाणा तीर्थ के मध्य में नारलाई तीर्थ स्थित है| "नारलाई" नाम नड्डुलडागिका, नंदकुलवती, नड्डुलाई का अपभ्रंश है| जिसके प्रमाण प्राचीन पुस्तकों एवं नारलाई जैन मंदिरों में स्थित शिलालेखों से मिलते हैं| ऐतिहासिक रास संग्रह भाग-२ के अनुसार इस गाँव को कभी वल्लभपुर नाम से भी जाना जाता था|

मुगल सम्राट अकबर को प्रतिबोधित करने वाले जगतगुरु महान आचार्य श्री विजय हीर सूरीश्वरजी के शिष्यरत्न श्री विजयसेन सूरीश्वरजी एवं महान् जैन कवि श्री ऋषभदासजी की जन्म-भुमि है यह नारलाई गाँव| संवत् १६०७ एवं संवत १६०८ में श्री विजय हीर सुरीश्वरजी को पंन्यास पद एवं उपाध्याय पद से अलंकृत करने का सौभाग्य इसी गाँव के जैन संघ को प्राप्त हुआ था|

नारलाई गाँव को यदि मंदिरों की नगरी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी| इस गाँव में पुरातत्व की द्ष्टी से महत्वपूर्ण, भव्य कलात्मक एवं विशाल बिंबों से सुशोभित शिखरबद्ध ग्यारह जिन मंदिर है| जिन में परस्पर सन्मुख दो पहाडियों पर स्थित शत्रुंजय एवं गिरनार महातीर्थों के लघु स्वरुप भी विद्यमान हैं|